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घुटने में गठिया होने पर घबराएं नहीं, ये बुढ़ापे की निशानी नहीं

कभी-कभी जोड़ गठिया के हो जाने से घुटने की क्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ता है और उसके कारण दबाव से शरीर का जो बचाव होना चाहिए वह नहीं हो पाता, फलस्वरूप पीड़ा होने लगती है, जिससे आप के जीवन का आनंद कम हो जाता है। पीडी हिंदुजा अस्पताल के डॉ. संजय अग्रवाल हमें बता रहे हैं कि घुटनों में गठिया हो जाना बुढ़ापे का लक्षण नहीं है।

घुटना शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह अरु अस्थि के निचले भाग, टिबिया के ऊपरले भाग और घुटना फलक से मिलकर बनता है। एक स्वस्थ्य घुटना जोड़ में अस्थियों ‘हड्डियों के बीच उपस्थित होती है जो गद्दी का काम करती है। यह गद्दी घुटने के ऐसे सरकने वाले संचालन में सहायता करती है जो अनायास और अबाध भी हो। स्वस्थ घुटना जोड़ में एक जोड़ संपुटिका भी होती है जिसमें शेषक झिल्ली होती है। यह झिल्ली स्नेहक द्रव पैदा करती है जिससे घुटना का बाधा रहित संचलन होता है। मानव के घुटना की रचना ऐसे की गई है कि वह आजीवन भाग दौड़ को सहन कर सके। किंतु कभी-कभी जोड़ गठिया के हो जाने से घुटने की क्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ता है और उसके कारण दबाव से शरीर का जो बचाव होना चाहिए वह नहीं हो पाता, फलस्वरूप पीड़ा होने लगती है, जिससे आप के जीवन का आनंद कम हो जाता है। पीडी हिंदुजा अस्पताल के डॉ. संजय अग्रवाल हमें बता रहे हैं कि घुटनों में गठिया हो जाना बुढ़ापे का लक्षण नहीं है।

घुटना गठिया वृद्ध होने का लक्षण नहीं है। यह संधियों जोड़ों का उत्तेजक रोग है जो यह आवश्यक नहीं कि वह आयु बढऩे की सामान्य क्रिया ही हो। वास्तव में जोड़ गठिया के रोगियों में तो ये लक्षण 20 से 30 वर्ष की अवस्था में दिखने लगते हैं। यद्यपि जोड़ गठिया कई प्रकार के होते है, एक सबसे आम रोग अस्थि-जोड़ गठिया है। इससे विश्व में लाखों लोग पीडि़त हैं। जोड़ गठिया से उपस्थित की उन पर्तों को स्थायी क्षति पहुंच जाती है जो जोड़ को संघट्ट से बचाती है। चूंकि उपास्थि की मरम्मत नहीं हो सकती अथवा स्वयं अपनी पुन:पूर्ति नहीं कर सकती, यह फटने लगती है, घिस जाती है और फलस्वरूप लुप्त हो जाती है। वह गद्दी जिसकी आपके घुटनों को दबाव को सह लेने के लिए आवश्यकता पड़ता है, लुपत हो जाती है। फलस्वरूप अस्थि से अस्थि हड्डी टकराने लगती है। पुराने रोगियों में अस्थियां इतनी खुरदरी और एक दूसरे से रगड़ने से ऐसी गड्ढेदार हो सकती हैं कि उनसे अस्थित खांग बन जाते हैं जिनसे प्राय:जकडऩे हो जाती है।

डॉ. संजय अग्रवाल

अस्थि जोड़ गठिया की आरंभिक अवस्थाओं में, आपका घुटना कड़ा और सूजा हुआ हो सकता है। बाद में आपको दर्द हो सकता है और ऐसा लग सकता है कि एक टांग कुछ छोटी या दूसरी की तुलना में अधिक टेढी हो गई है। फलस्वरूप आप का चलना-फिरना सीमित हो सकता है और आपको अपनी जीवन शैली अपने पीडि़त, गठिया वाले घुटनो के अनुसार बदलनी पड़ सकती है। यदि आपक वजन अधिक है या आपमें टेढ़ा-मेढ़ापन है, तो आप के घुटनों पर पडऩे वाले अतिरिक्त दबाव से क्षति बढ़ सकती है। यह भी कारण है जिससे जोड़ गठिया से पीडि़त लोग बुढ़ापा सा महसूस करने लग सकते हैं भले ही वे अभी जवान ही हों, किंतु आशा की किरणें हैं-आपके पास विकल्प हैं।

पूर्ण घुटना बदल शल्य चिकित्सा एक चुनिंदा क्रिया विधि है। अपने चिकित्सक के साथ, आप यह निर्णय लेंगे कि इस चिकित्सा का उचित समय कौन सा है, हो सकता है कि चिकित्सक ने आप का उपचार मात्र सादी औषधियों द्वारा, उत्तेजना-रोधी दवाओं द्वारा अथवा छोटी शल्य क्रिया द्वारा किया हो। किंतु अब दर्द असहनीय हो गया है। यहां तक चलना-फिरना रोक देने से भी कुछ नहीं होता। आप पीड़ा के कारण रात को सो भी नहीं सकते। आप स्वयं ही कदाचित सबसे अच्छे निर्णायक हैं कि कब अंतिम तौर पर पूर्ण घुटना बदल शल्य चिकित्सा करावाई जाए। जब दर्द इतना बढ़ जाए कि औषधि से उपचार बेकार हो जाए, तो कदाचित शल्य चिकित्सा कराने का विचार करना आवश्यक होगा।

विगत कुछ वर्षो में शल्य चिकित्सकों और विनिर्माओं ने संधि बदल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशिष्ट प्रगति की है। वस्तुएं टिकाऊ और लंबी अवधि तक काम देने योग्य हैं। शल्य क्रियाविधि सूक्ष्म तालमेल वाली है। फलस्वस्प सफल परिणाम की उत्कृष्ट संभावनाएं हैं। अब इस नए युग के कंप्यूटर नेविगंटिड हिप व नी रिप्लेसमेंट द्वारा इस त्रुटि से निवारण मिल गया है। सूक्ष्मता कंप्यूटर के साथ सर्मथ होकर एक डिग्री व 0।1 मिली मी के सामंजस्य से न्यूनतम सूक्ष्म गणना करता है। इसके अतिरिक्त कंप्यूटर द्वारा व्यक्ति में परिवर्तन जैसे नाप, आकार, संरेखण सतह आदि पहचानी जाती है और उपयुक्त संशोधन का सुझाव दिया जाता है। वास्तविक शल्य चिकित्सक सर्जन स्वयं होता है, लेकिन कंप्यूटर इमेज संरेखण व मिनट करेक्शन उपलब्ध करता है, इसके फलस्वरूप ,प्रत्यारोपण लंबे समय तक, कठिन केसों में शल्य क्रिया का समय कम होना, चीरे का नाप छोटा होना और मानव त्रुटि का न्यूनतम होना। अतिरिक्त रूप से, यह सिस्टम हड्डियों के मिडलरी केनाल के प्रारंभ से बचना, डीप वेन थ्रोमबोसिस की संभावना कम होना और घातक पलमोनरी एंबोलिज्म को भी न्यूनतम कर देता है।

बूढ़े हो रहे व्यक्तियेां में यह धारणा होती है कि यह जोड़ बदलवाने के लिए उनकी उम्र निकल चुकी है। 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके अधिकांश व्यकित यह यही सोचते हैं कि इस बुढ़ापे में इतनी महंगी शल्य क्रिया उन्हें शोभा नहीं देती। परंतु यह गलत सोच है। प्रथम तो यह कि इस प्रकार की शल्य क्रिया के लिए उम्र किसी प्रकार भी बाधक नहीं है और दूसरी बात यह है कि खराब हो चुके जोड़ों को बदलवाने के पश्चात् जीवन स्तर में सुधार होता है। अब कृत्रिम जोड़ों का प्रत्यारोपण संभव हो गया है। लेकिन यदि आप प्रौढ़ावस्था में हड्डियों के रोगों से बचना चाहते हैं तो अपनी जीवन चर्या में थोड़ा सुधार कर लें। घी, चीनी, चिकनाई कम खाएं, संतुलित आहार लें। खाने में कैल्शियम की मात्रा पर्याप्त रखें, साग-सब्जी अवश्य खाएं और थोड़ा बहुत व्यायाम करें तो सेहत के लिए फायदेमंद होगा। महिलाओं के लिए चिकित्सों की सलाह है कि मोटापे से बची रहें और उठने-बैठने की आदत में सुधार करें ताकि घुटनों पर ज्यादा जोर न पड़े।

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