Breaking NewsPopularTSH Specialअंतरराष्‍ट्रीयओपिनियनखुल्लम खुल्लाताजा खबरदिल्लीदेशन्यूज़बड़ी खबरब्लॉगराजनीतिराजनीतिक किस्सेराज्‍यलोक सभा चुनाव 2019

“मोहन भागवत और आरक्षण” बार-बार बात क्यों ?

सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान के बाद सियासी हलकों में एक बार फिर से हलचल बढ़ गई है.

नॉएडा: दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “आरक्षण के विरोधी और उसके समर्थक अगर एक दूसरे की बात समझ लेंगे तो इस समस्या का हल चुटकी में निकाला जा सकता है.”

उन्होंने कहा, “एक दूसरे की भावनाओं को समझना चाहिए. ये सद्भावना जब तक समाज में पैदा नहीं होती तब तक इस मसले का हल नहीं निकल सकता.”

उनके वक्तव्य की कांग्रेस और बसपा ने कड़ी निंदा की है.
अगर बात एनडीए के सहयोगी साझीदार दल जैसे रामदास अठावले और रामविलास पासवान ने इस बयान पर अपनी असहमति दर्ज कराई है.

इससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव के वक़्त मोहन भागवत ने आरक्षण को लेकर जो बयान दिया था, उससे भी काफ़ी बवाल मचा था.

उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मोहन भागवत के बयान पर सफ़ाई दी थी.

इस समय भी मोहन भागवत के बयान पर आरएसएस की तरफ़ से सफ़ाई दी गई है कि संघ का आरक्षण से विरोध नहीं है. आरक्षण के मुद्दे पर सर्वसम्मति से बात होनी चाहिए.

संघ के स्पष्टीकरण के मुताबिक़, ‘मोहन भागवत ने अपने बयान में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए अपील की है.’
संघ और आरक्षण
संघ ने अभी तक आरक्षण के मुद्दे पर जो रुख़ अपनाया है, उस पर अगर ग़ौर किया जाए तो संघ ने हमेशा ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कही है.

संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने अपनी किताब ‘विचारधन’ में लिखा है, “साल 1950 में जब भारत गणतंत्र बना तब डॉक्टर आंबेडकर ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए दस साल के लिए आरक्षण की व्यवस्था अपनाने की बात कही थी. बाद में यह अवधि लगातार बढ़ाई गई. जाति के आधार पर आरक्षण देने की वजह से स्वतंत्र समाज के तौर पर उनका अस्तित्व निर्माण हुआ. समाज के सभी तबकों में ग़रीब लोग रहते हैं. इसलिए आरक्षण की सुविधा आर्थिक आधार पर दी जानी चाहिए. अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ़ दलितों को ही आरक्षण मिल रहा है, ये भावना ख़त्म हो जाएगी.”

राजनीतिक विश्लेषक और ‘आरएसएस’ क़िताब के लेखक जयदेव डोले का मानना है कि संघ की भूमिका आरक्षण के ख़िलाफ़ है.

वह कहते हैं, “जब संविधान तैयार हो रहा था, तो गोलवलकर ने हमेशा आरक्षण का विरोध किया था. आरक्षण दस साल के लिए है और यह रद्द करना चाहिए, ऐसा उन्होंने कई बार कहा था. दस साल के लिए जो आरक्षण था, वो एक राजनीतिक आरक्षण था. बाद के सरसंघचालक बालासाहब देवरस का मानना था कि छुआ-छूत बंद होनी चाहिए. लेकिन उन्होंने ग़ैर-बराबरी और छुआछूत बंद करने के लिए कोई ठोस योजना सामने नहीं रखी थी. छुआछूत और ग़ैर-बराबरी ख़त्म करने के लिए आरक्षण एक महत्वपूर्ण तरीक़ा है लेकिन देवरस ने इस पर ज़्यादा कुछ कहा नहीं था.”

संघ और आरक्षण

संघ ने अभी तक आरक्षण के मुद्दे पर जो रुख़ अपनाया है, उस पर अगर ग़ौर किया जाए तो संघ ने हमेशा ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कही है.

संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने अपनी किताब ‘विचारधन’ में लिखा है, “साल 1950 में जब भारत गणतंत्र बना तब डॉक्टर आंबेडकर ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए दस साल के लिए आरक्षण की व्यवस्था अपनाने की बात कही थी. बाद में यह अवधि लगातार बढ़ाई गई. जाति के आधार पर आरक्षण देने की वजह से स्वतंत्र समाज के तौर पर उनका अस्तित्व निर्माण हुआ. समाज के सभी तबकों में ग़रीब लोग रहते हैं. इसलिए आरक्षण की सुविधा आर्थिक आधार पर दी जानी चाहिए. अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ़ दलितों को ही आरक्षण मिल रहा है, ये भावना ख़त्म हो जाएगी.”

राजनीतिक विश्लेषक और ‘आरएसएस’ क़िताब के लेखक जयदेव डोले का मानना है कि संघ की भूमिका आरक्षण के ख़िलाफ़ है.

वह कहते हैं, “जब संविधान तैयार हो रहा था, तो गोलवलकर ने हमेशा आरक्षण का विरोध किया था. आरक्षण दस साल के लिए है और यह रद्द करना चाहिए, ऐसा उन्होंने कई बार कहा था. दस साल के लिए जो आरक्षण था, वो एक राजनीतिक आरक्षण था. बाद के सरसंघचालक बालासाहब देवरस का मानना था कि छुआ-छूत बंद होनी चाहिए. लेकिन उन्होंने ग़ैर-बराबरी और छुआछूत बंद करने के लिए कोई ठोस योजना सामने नहीं रखी थी. छुआछूत और ग़ैर-बराबरी ख़त्म करने के लिए आरक्षण एक महत्वपूर्ण तरीक़ा है लेकिन देवरस ने इस पर ज़्यादा कुछ कहा नहीं था.”

आरक्षण

‘आरक्षण तो अधिकार है’

जयदेव डोले आगे कहते हैं, “संघ का मानना है कि आरक्षण की वजह से हिंदू एकता में बाधा आती है. संघ के सभी सरसंघचालक ये मानते थे कि हिंदू एकता में विभाजन नहीं होना चाहिए. आरक्षण से हिंदू समाज में बंटवारा होता है.”

“आरक्षण एक अधिकार है और अधिकार पर चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है. वास्तव में आरक्षण के समर्थकों और विरोधियों को बातचीत के लिए आमने-सामने आने की ज़रूरत नहीं है. आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान है. आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है. उस अधिकार को लेने या न देने पर क्या बातचीत हो सकती है.”

‘माहौल बनाने की कोशिश’

मुंबई से छपने वाले अख़बार ‘लोकसत्ता’ के वरिष्ठ पत्रकार महेश सरलष्कर कहते हैं, “आरएसएस आरक्षण के मुद्दे को लगातार उठाता रहा है और इस पर चर्चा करना चाहता है. लंबे समय से संघ की ये इच्छा रही है कि आरक्षण पर पुनर्विचार हो और अब वो इस विचार पर आक्रामक रूप से बहस करना चाहता है क्योंकि केंद्र में उसकी समर्थक सरकार है.”

“संविधान के अनुच्छेद 370 के हटने से पहले ही संघ ने कहा था कि इस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. भाजपा के सत्ता में आने के बाद इसे ख़त्म करने का निर्णय लिया गया. आरक्षण के बारे में भी संघ कहता रहा है कि इस पर पुनर्विचार होना चाहिए. संघ के लोगों को लगता है कि अभी अनुकूल माहौल है और सद्भावपूर्ण वातावरण में इस पर चर्चा की जा सकती है. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि क्योंकि दिल्ली में भाजपा सत्ता में है.”

महेश सरलष्कर कहते हैं, “एनडीए के घटक दल भी संघ की आरक्षण पर पुनर्विचार नीति को लेकर सहमत नहीं हैं. लेकिन ये अभी भी संघ की रणनीति है कि इस मुद्दे को लगातार हवा देते रहें और ख़बरों में बनाए रखें. मोहन भागवत का बयान इसी रणनीति का हिस्सा है.”

संघ का क्या कहना है?

आरएसएस के क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख प्रमोद बापट ने बीबीसी मराठी से कहा, “आरक्षण के मुद्दे पर संघ का मानना है कि जिनको आरक्षण का लाभ मिल रहा है, वे इसका लाभ लें या लेना छोड़ दें, ये उन पर ही निर्भर करता है.”

“आरक्षण चाहिए या नहीं चाहिए, इस पर चर्चा करने के बजाय जिनको आरक्षण मिल रहा है, उनको आरक्षण का क्या फ़ायदा हुआ, इसका मूल्यांकन होना चाहिए.”

(“द संडे हेडलाइंस” के यहां क्लिक कर सकते हैं आप हमें फ़ेसबुकट्विटरइंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं ) 

Show More
[whatsapp_share]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close